अक्टूबर 28, 2026
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डॉ. सईद-उर-रहमान आज़मी नदवी का देहांत

दारुल उलूम नदवतुल उलमा के मोहतमिम, इंटीग्रल यूनिवर्सिटी के संस्थापक व पूर्व वाइस चांसलर (कुलपति), और अरबी भाषा व साहित्य के दिग्गज विद्वान मौलाना डॉ. सईद-उर-रहमान आज़मी नदवी

लखनऊःअंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित इस्लामी शिक्षण संस्थान दारुल उलूम नदवतुल उलमा के मोहतमिम, इंटीग्रल यूनिवर्सिटी के संस्थापक व पूर्व वाइस चांसलर (कुलपति), और अरबी भाषा व साहित्य के दिग्गज विद्वान मौलाना डॉ. सईद-उर-रहमान आज़मी नदवी का लंबी बीमारी के बाद आज इंतकाल हो गया। उनके निधन से वैश्विक शैक्षणिक, साहित्यिक और दीनी हलकों में शोक की लहर दौड़ गई है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
मौलाना का जन्म 14 मई 1934 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुआ था। उनके पिता का नाम मौलाना मुहम्मद अय्यूब आज़मी (रह.) था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक दीनी शिक्षा (आलिमियत व फ़ज़ीलत) जामिया मिफ्ताहुल उलूम, मऊ से प्राप्त की। इसके बाद दारुल उलूम नदवतुल उलमा, लखनऊ से अरबी साहित्य में विशेषज्ञता (तखस्सुस) हासिल की। उच्च शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण (टीचर्स ट्रेनिंग) के लिए वे बगदाद विश्वविद्यालय, इराक गए, जहाँ उन्होंने प्रसिद्ध विद्वान अल्लामा डॉ. मुहम्मद तक़ीउद्दीन हिलाली मराकशी के सान्निध्य में रहकर विशेष योग्यता अर्जित की।
नदवा के शैक्षणिक व प्रशासनिक स्तंभ
डॉ. सईद-उर-रहमान आज़मी ने 1955 से दारुल उलूम नदवा में एक शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएँ शुरू कीं। 1993 से 1999 तक वे अरबी भाषा एवं साहित्य संकाय (कुल्लियतुल लुग़तुल अरबिया) के डीन रहे। वर्ष 2000 में उन्हें नदवतुल उलमा के मोहतमिम (प्रिंसिपल) की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसे उन्होंने 2026 तक अत्यंत कुशलता से निभाया। इसके अतिरिक्त, वे नदवतुल उलमा की जामा मस्जिद के इमाम व खतीब भी थे।
संस्थाओं की स्थापना और अहम जिम्मेदारियां
उनका संस्थागत योगदान अत्यंत व्यापक था:
संस्थापक व पूर्व वाइस चांसलर: इंटीग्रल यूनिवर्सिटी, लखनऊ।
संस्थापक सदस्य: आलमी राब्ता अदब इस्लामी (1986) और दार-ए-अरफात (रायबरेली)।
उपाध्यक्ष: दीनी तालीमी काउंसिल, उत्तर प्रदेश।
पत्रकारिता और दावती सफर
मौलाना ने 1955 में ख्याति प्राप्त अरबी मासिक पत्रिका ‘अल-बाअसुल इस्लामी’ (Al-Baas-ul-Islami) और 1959 में पाक्षिक ‘अर-रायद’ (Ar-Raid) की शुरुआत के समय से ही सह-संपादक और बाद में प्रधान संपादक के रूप में दशकों तक सेवा दी। अपने दावती और शैक्षणिक मिशन के तहत उन्होंने सऊदी अरब, मिस्र, यूएई, कुवैत, कतर, ओमान, सीरिया, इराक, जॉर्डन, तुर्की, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, सिंगापुर, फिजी, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन की यात्राएं कीं।
सैकड़ों किताबों के लेखक
उन्होंने अरबी और उर्दू में अनगिनत उच्च कोटि की रचनाएं लिखीं और कई महत्वपूर्ण अनुवाद किए:
प्रमुख अरबी रचनाएं: शुअरा-उर-रसूल फ़ी ज़ौ-इल-वाक़े वल-क़रीज़, साअत मअल आरिफ़ीन, सुवर मिन वाक़े-उद-दीन, मुद्दिस-उल-हिंद अल-कबीर हबीब-उर-रहमान अल-आज़मी, नदवतुल उलमा तुवाजिहु अत-तहद्दी अल-कबीर।
प्रमुख उर्दू रचनाएं: उस्वा-ए-हसना के आईने में, इस्लाम और मग़रिब, इल्म-उत-तसरीफ़, तज़किरा अहल-ए-दिल, इस्लामी सक़ाफ़त और नदवतुल उलमा।
पुरस्कार एवं सम्मान
अरबी भाषा व साहित्य में उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1994 में उन्हें प्रतिष्ठित ‘राष्ट्रपति पुरस्कार’ (Presidential Award) से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें मौलाना अहमद प्रतापगढ़ी अवार्ड (लखनऊ), मौलाना अली मियां अवार्ड (मुंबई), और मौलाना अब्दुल हमीद फिरंगी महली अवार्ड (लखनऊ) सहित सैकड़ों राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया।
उनके इंतकाल को इस्लामी जगत और शैक्षणिक दुनिया ने एक अपूरणीय क्षति करार दिया है। देश-विदेश के उलेमा, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और छात्रों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए उनके दर्जे की बुलंदी और परिजनों के लिए सब्र-ए-जमील की दुआ की है।

नौशाद खान नदवी,रिपोर्टरःनहदा नेटवर्क लखनऊ

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