नई दिल्ली/नीलांबुर, 23 सितंबर: कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाद्रा ने बुधवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यदि सीईसी को चुनावों में कथित धांधली की जानकारी थी और उन्होंने उसे होने दिया, तो यह ‘‘देश के साथ विश्वासघात’’ और ‘‘देशद्रोह का कृत्य’’ है।
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, नीलांबुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान प्रियंका गांधी ने कहा कि उनके भाई और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार निर्वाचन आयोग के माध्यम से हो रहे ‘‘पक्षपात और अन्याय’’ का मुद्दा उठाते रहे हैं।
उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने कई मुद्दों को बार-बार उठाया है और अब ऐसी खबरें भी सामने आ रही हैं कि निर्वाचन आयोग के दो आयुक्तों ने स्वयं मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के समक्ष कुछ मामलों पर आपत्ति जताई है।
प्रियंका गांधी ने कहा, ‘‘इसलिए मुझे लगता है कि यह हमारे लोकतंत्र के लिए बेहद गंभीर मुद्दा है, क्योंकि अगर चुनाव ही नहीं होंगे तो लोकतंत्र कहां रहेगा?’’
यह बयान ऐसे समय आया है जब एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में निर्वाचन आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार, ये आपत्तियां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) सहित कई मामलों से संबंधित थीं।
पीटीआई के अनुसार,शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने बुधवार को निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेद सामने आने संबंधी खबरों का हवाला देते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को बर्खास्त कर जेल भेजने की मांग की।
एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए ठाकरे ने महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हुए पिछले विधानसभा चुनावों को रद्द करने तथा इन राज्यों में बैलेट पेपर के जरिए दोबारा चुनाव कराने की भी मांग की।
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा, ‘‘ज्ञानेश कुमार को तुरंत बर्खास्त किया जाना चाहिए और उन्हें जेल भेजा जाना चाहिए।’’
हालांकि, निर्वाचन आयोग से जुड़े सूत्रों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले तीनों आयुक्तों की मंजूरी के साथ सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग ने यह भी कहा कि किसी मुद्दे पर आयुक्तों द्वारा सवाल उठाना या अपनी राय रखना प्रक्रिया का हिस्सा है और असहमति की स्थिति में बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
